प्रेम पत्र (Love Letter)

Hello Everyone,

Hope the weekend’s going well for you just like it’s going for me. I have been a lazy, fat cat today and I hope Sunday goes the same way but I know that it won’t. Got tonnes to do tomorrow.  But I thought I’ll share this set of poems I came across while I was reading a friend’s blog, before I get busy with things.

Some of you may already know Shubhankar Sharma, who blogs by the name of Confused Thoughts (FYI, I don’t know why he chose this pen name. For someone as young as he, he has decidedly a very level head). His posts have featured as Guest Posts on my blogs a couple of times. His pair of poems is funny, conventional and witty, and had me in splits. Not one to pass up the chance on sharing humor, I thought I’ll bring these to you guys to enjoy.

It is in Hindi, and for those who may not be able to understand it, here’s a gist –

A young couple are separated because of the boy’s admission into a faraway college, unlike the Girl who stays in the hometown pursuing further education from a local college. The boy becomes busy with life, and studies, and the girl starts feeling neglected. So she pens him a poem admonishing and begging him to write to her more often (this one’s set in the pre-mobile phone/internet era). That’s the first poem.

The second poem is the boy’s response to her, and this is where the fun starts. Shubhankar has used pure mathematical terms, as used in Hindi, to express the boy’s love and loneliness in the poem. I’ve never claimed to be good at Hindi, but I swear some of the terms he used, were beyond my grasp, and had me looking them up on the internet.

You could always use the translator on the sidebar of this blog to translate the page, or you could even use Google Translator, but if (and it’s very likely) translator is unable to translate certain words correctly, feel free to ask, NOT ME (I’m lousy at Classical Hindi), but the poet himself.

Without further ado, here are the poems…


एक प्रेमी युगल उच्च शिक्षा के लिए एक दूसरे से बिछड़ जाता है !

प्रेमिका ने पास के ही एक कॉलेज में BA  में दाखिला लिया है और प्रेमी को दूसरे शहर इसलिए जाना पड़ता है क्योंकि पास के कॉलेज में B.Sc Mathmetics नहीं थी |अब दोनों को गए आधा वर्ष बीत गया इस बीच दोनों की ना कोई बात हुई ,ना कोई मिलाप हुआ !

आखिर होता भी कैसे उस जमाने में ना फोन होते थे ना ही यातायात इतना अच्छा था , होते थे तो सिर्फ पत्र !जिनसे लोग खूब सारे विचार एक बार में भेज देते थे फिर महीनों बाद पत्र का जवाब आता था और कभी कभी तो वो पत्र रास्ते में गुम हो जाता !

खैर मुद्दे पर आते हैं , हुआ ये की प्रेमी ने कोई पत्र नहीं लिखा वो पढ़ाई में इतना व्यस्त था और नए शहर में तालमेल बनाने में उसका सारा समय निकल जाता था ,अब ऐसे में प्रेमिका गुस्से में आकर एक पत्र भेजती है तो पढ़िए मैंने उस काल्पनिक पत्र को कविता के रूप में लिखा है !


प्रेमिका 

प्रेमी मेरे ,ओ प्राण प्यारे!

तुम्हारी प्राण-प्यारी तुम्हें पुकारे,

छः मास बीत गए अब ,

प्रतीक्षा में नयन अश्रुमय हो गए हैं अब !

आओगे या नहीं भी आओगे,

कुविचारों से तन-मन भयभीत भये अब|

सांसारिक सुख सब बेस्वाद हो गए हैं ,

मेरे चहकते विचार अब अवसाद ग्रसित हुए हैं !

अब रौनकें नहीं हैं बगीचे में तुम बिन,

कोयल की मधुर ध्वनि भी कर्कश लगती है तुम बिन |

वो आम के पेड़ों पर बौर नहीं आयी इस बार !

शायद तुम्हारे जाने से नाराज हैं ,

या फिर ये हो ऋतुओं का प्रभाव !

अब सांयकाल में छत पर सन्नाटा रहता है ,

मैं गयी थी दो तीन दिन लगातार!

जब तुम मुझे वहां दूर वाली छत पर दिखाई नहीं देते ,

तो अब मैंने जाना ही बंद कर दिया |

विरह मेरे जीवन में कृष्ण पक्ष की काली अंधेरी रात की तरह छा गया है !

मेरी आँखों में तो जैसे किसी समुद्र का सैलाब आ गया है |

तुम बिसार दिए हो और प्रेम भी नहीं करते मुझे अब शायद!

पढ़ाई में इतने तल्लीन हुए हो ,

या फिर मेरी कोई सौतन मिल गयी है अब तुम्हें शायद|

तुम भूल गए वो सर्दियों के दिन !

जब बर्फ़ीली ठंडी हवाओं के बावजूद,

हम दोनों अपनी अपनी छत से एक दूसरे को इतनी दूर से निहारते थे!

तुम भूल गए वो पुराने दिन,

जब बाग से खट्टे आम चुराकर तुम मेरे लिए लाते थे |

ध्यान है ना !वो दिन जब तुम्हारे स्कूल की छुट्टी के इंतेजार में,

मैं पूरे एक घन्टे वहाँ चौराहे पर खड़ी रहती थी !

फिर हम दोनों साथ में पूरे रास्ते अपनी अपनी साईकल चलाते हुए बात करते – करते घर जाते थे |

मगर अब तुम्हें इन सब बातों की कोई चिंता नहीं है!

तभी आज तक चिट्ठी ना कोई संदेश आया ?

ना ये सोचा कि तुम बिन मेरी दशा कैसी है?

तुम्हारे मन में ना तनिक भी ये   ख्याल आया |

जरूर तुम्हें अब कुछ ना याद होगा ,

मुझसे तनिक भी प्रेम रहा ना होगा|

≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡

प्रेमी  –

प्रेमिका मेरी ओ प्राण प्यारी!

तुम्हे एक पल हृदय से ना दूर किया है ,

तुम्हारा और मेरा संग तो रसायन विज्ञान में जल बनाने की प्रक्रिया है !

जैसे हाइड्रोजन नहीं छोड़ सकती ऑक्सीजन का संग,

भगवान ने ऐसा रचा है ,हमारा प्रेम प्रसंग|

दुविधा सुनो मेरा क्या हाल हुआ है,

पूरा समय गति के समीकरणों में उलझ गया है !

कभी बल लगाकर पढ़ाई की दिशा में बढ़ता हूँ,

कभी तुम्हारे प्रेम की क्रिया प्रतिक्रिया से पीछे तुम्हारी दिशा में खींचता हूँ|

मेरे विचारों का पाई ग्राफ उलझ जाता है ,

ये Tan@  के मान की तरह कभी ऋणात्मक अनंत तो कभी धनात्मक अनंत तक जाता है !

मेरे ग्राफ रूपी जीवन में सारे मान अस्थिर हैं ,

मगर तुम्हर स्थान मेरे हृदय में पाई(π) के मान की तरह स्थिर है|

मेरे दिन की व्यस्तता लघुत्तम समपवर्त्य (H.C.F )  जैसी है ,

मेरे कॉलेज का समय भाजक(Divisor) की तरह पूरे दिन रूपी भाज्य(Dividend) समय को बड़े भागफल(Quotient) से विभाजित करता है !

और फिर वो शेषफल भाजक का रूप धारण कर लेता है ,

बस यही प्रक्रिया अंत तक चलती है !

जब तक शेषफल(Remainder) रूपी समय शून्य ना हो जाये,

अब बताओ ऐसे में पत्र लिखने का समय कहाँ से लायें|

तुम्हारी यादें मेरे लिए गुणांक(Coefficient) के जैसी हैं ,

जो दिन प्रतिदिन मेरे प्रेम को ,

गुणनफल(Resultant) के रूप में कई गुणा वर्धित करती हैं !

तुम्हारे अलावा किसी और लड़की के बारे में सोच भी नहीं सकता ,

क्योंकि तुम्हारे अलावा बाकी सबकी छवि मेरे विशाल मान रूपी हृदय में दशमलव के बाद आने वाले तीन बिंदुओं जैसी है |

हमारा अलगाव , भटकाव सब काल्पनिक मान हैं ,

जो हमारे प्रेम रूपी वास्तविक मान के आगे कहीं नहीं रह जाता !

ये सब मोह माया मुझे कितना भी भ्रमित करें ,

मगर तुम्हारे शून्य रूपी शक्तिशाली प्रेम से विभाजित होकर सब शून्य में मिल जाता है |

 

परिस्थितियों ने मुझमें से तुम्हें घटाकर ये सोचा कि प्रेम का मान कम हो जाएगा !

मगर परिस्थितियों को हमारे बारे में अभी पता ही क्या है ?

शून्य को घटा लो चाहे जोड़ लो कितना भी !

हमारे प्रेम का मान तो फिर भी वही स्थिर (Unchanged) आएगा |

अब मैं अपने शब्दों को विश्राम देता हूँ,

अपने गणित के सिद्धांतों को विराम देता हूँ |

Shubhankar Sharma @ Confused Thoughts

Note: He also has the two poems up on his YouTube channel, Kalrav. Check it out if you would rather listen to it.

15 thoughts on “प्रेम पत्र (Love Letter)

  1. मैंने पढ़ा है वाकई लाजवाब जोड़ी है।काबिले तारीफ। अच्छा किया बहुत लोगों को ये जोड़ी पसंद आएगी।

    Liked by 1 person

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